पीतल की दुकान पर सजी दर्जनों मूर्तियों के बीच विष्णु को पहचानना सबसे आसान होता है। चेहरा शांत, सिर पर ऊंचा मुकुट, गले में वनमाला, और चार हाथ, जिनमें से तीन में कुछ न कुछ थमा हुआ है। दुकानदार से पूछिए कि यह गोल सा दांतेदार पहिया क्या है, तो जवाब मिलता है, चक्र है। पूछिए कि चक्र क्यों है, तो अक्सर बातचीत वहीं रुक जाती है। जबकि असल दिलचस्पी की जगह ठीक वही है, क्योंकि ये चारों वस्तुएं सजावट नहीं, एक पूरी शब्दावली हैं।
मूर्तिकला में देवताओं को उनके आयुधों से पहचाना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने चित्र में तलवार और तराजू देखकर न्याय की मूर्ति पहचानी जाती है। शिव के पास त्रिशूल और डमरू, गणेश के पास पाश और अंकुश, देवी के पास खड्ग। विष्णु की पहचान शंख, चक्र, गदा और पद्म से बनती है, और यह पहचान इतनी टिकाऊ है कि छठी सदी की बादामी की गुफा में उकेरी गई मूर्ति और आज तिरुपति के बाहर बिकने वाले कैलेंडर, दोनों में वही चार चीज़ें उन्हीं अर्थों के साथ मौजूद हैं। सवाल यह है कि परंपरा ने इनमें से हर वस्तु में क्या पढ़ा, और चार हाथों की ज़रूरत आखिर क्यों महसूस हुई।
चार भुजाएं: पूर्णता दिखाने का दृश्य तरीका
दो हाथ मनुष्य के होते हैं। जिस क्षण किसी आकृति में तीसरा हाथ जोड़ा जाता है, दर्शक को यह संकेत मिल जाता है कि सामने जो है वह मानवीय सीमा के भीतर नहीं है। यह भारतीय कला की सबसे पुरानी युक्तियों में से एक है, और यह केवल विष्णु तक सीमित नहीं। पत्थर या धातु की मूर्ति एक स्थिर माध्यम है, उसमें गति नहीं दिखाई जा सकती। अतिरिक्त भुजाएं इसी सीमा का हल हैं, वे एक ही देह में कई कार्यों को एक साथ घटित होते दिखा देती हैं। एक हाथ अस्त्र थामे है, दूसरा आशीर्वाद दे रहा है, तीसरा फूल अर्पित कर रहा है। मनुष्य ये काम बारी-बारी करेगा। देवता के लिए ये तीनों एक ही क्षण में हो रहे हैं।
चार की संख्या को लेकर परंपरा में एक ही व्याख्या नहीं मिलती, कई व्याख्याएं साथ-साथ चलती हैं और उन्हें आपस में काटने की कोशिश भी नहीं की गई। सबसे आम व्याख्या चार दिशाओं की है, यानी रक्षा किसी एक ओर से नहीं, चारों ओर से एक साथ। दूसरी व्याख्या चार वेदों की ओर इशारा करती है। तीसरी, और शायद सबसे सार्थक, चार पुरुषार्थों से जोड़ती है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। सामान्य जीवन में इन चारों में एक तनाव रहता है, कमाई करने वाला अक्सर धर्म से समझौता करता है, वैराग्य की ओर बढ़ने वाला अर्थ और काम को छोड़ देता है। चार भुजाओं वाला स्वरूप उस अवस्था का चित्र है जिसमें चारों एक साथ, बिना किसी को दबाए, थामे जा सकते हैं।
यह भी ध्यान देने लायक है कि विष्णु के सबसे लोकप्रिय रूप चार भुजाओं वाले नहीं हैं। राम धनुष लिए दो हाथों में दिखते हैं, कृष्ण बांसुरी लिए दो हाथों में। अवतार का पूरा अर्थ ही यह है कि ईश्वर स्वयं को मानवीय ढांचे में बांध लेता है, इसलिए वहां चार भुजाएं दिखाना उस विचार को ही तोड़ देता। चतुर्भुज रूप अवतार का नहीं, विष्णु के अपने स्वरूप का चित्र है। कुछ मूर्तियों में चौथे हाथ में कोई वस्तु होती ही नहीं, वह अभय मुद्रा में उठा रहता है, डरो मत कहने के लिए।

शंख: वह ध्वनि जिससे हर शुभ काम खुलता है
विष्णु का शंख पांचजन्य कहलाता है। पुराणों में वर्णित परंपरा के अनुसार यह नाम पंचजन नामक उस असुर से आया जो समुद्र के भीतर एक शंख में निवास करता था, और कृष्ण ने उसे पराजित करने के बाद यह शंख अपने पास रख लिया। महाभारत की कथा में यही पांचजन्य कुरुक्षेत्र के मैदान में बजता है, और उसकी ध्वनि युद्ध के आरंभ की घोषणा बन जाती है।
लेकिन शंख को केवल युद्ध-घोषणा मान लेना उसका अर्थ छोटा कर देना है। परंपरा में इसकी ध्वनि को ॐ से जोड़ा गया है, उस आदिनाद से जिसे सृष्टि के पहले की ध्वनि माना जाता है। इसीलिए मंदिर की आरती, विवाह की वेदी, गृहप्रवेश, हर शुभ आरंभ शंखनाद से खुलता है, समापन से नहीं। घरों में यह मान्यता आम है कि शंख की गूंज पूजा से पहले स्थान को साफ कर देती है, वातावरण को बैठा देती है। जो लोग शंख बजाते हैं वे जानते हैं कि इसमें एक ही लंबी सांस चाहिए, बीच में टूटी हुई ध्वनि अशुभ मानी जाती है, और शायद इसी वजह से इसे संकल्प और तैयारी का प्रतीक भी माना गया।
शंख का एक पहलू कम याद रखा जाता है। यह समुद्र से निकला है, और समुद्र मंथन की कथा में लक्ष्मी भी वहीं से आती हैं, इसी संबंध के चलते शंख समृद्धि का प्रतीक भी माना गया। दक्षिणावर्ती शंख, जिसका घुमाव दाहिनी ओर खुलता है, दुर्लभ होने के कारण कई घरों में बजाने के बजाय पूजा में रखा जाता है। विष्णु के चारों आयुधों में यह इकलौता है जो चोट नहीं करता, सिर्फ बोलता है।
सुदर्शन चक्र: सटीकता का अस्त्र
चक्र आमतौर पर ऊपरी दाहिने हाथ में होता है, और मूर्तिकार उसे प्रायः तर्जनी की नोक पर घूमता हुआ दिखाते हैं, पकड़ा हुआ नहीं। यह छोटा सा विवरण ही उसका आधा अर्थ है। जिस वस्तु को पकड़ने की ज़रूरत न पड़े, उस पर नियंत्रण पूरा माना जाता है। नाम भी इसी ओर इशारा करता है, सुदर्शन यानी वह जिसका दर्शन शुभ हो, या जो सही दृष्टि देता हो।
इसकी उत्पत्ति को लेकर कथाएं एक जैसी नहीं हैं। कुछ परंपराएं इसे शिव से प्राप्त वरदान बताती हैं, कुछ इसे देवशिल्पी विश्वकर्मा की गढ़ी हुई रचना मानती हैं। जो बात हर कथा में एक जैसी रहती है वह है इसका स्वभाव: छोड़े जाने के बाद यह लक्ष्य तक पहुंचता है और लौटकर हाथ में आ जाता है। कथाओं में इसे तब निकाला जाता है जब बाकी सारे उपाय चुक चुके होते हैं, और इसका निकलना ही संकेत होता है कि अब चीज़ें तय हो चुकी हैं।
प्रतीक के तौर पर चक्र को मन से जोड़ा जाता है, ठीक-ठीक कहें तो साधे हुए मन से, क्योंकि घूमते चक्र का संतुलन ही उसकी शक्ति है। इसे काल से भी जोड़ा जाता है, समय के उस पहिये से जो न रुकता है न पीछे मुड़ता है। और इसे विवेक से भी, उस क्षमता से जो सही और गलत के बीच बाल जितनी बारीक रेखा काट सके। दक्षिण भारत के कई वैष्णव मंदिरों में सुदर्शन को स्वतंत्र देवता के रूप में पूजा जाता है, उनका अलग सन्निधान होता है और सुदर्शन होम एक स्थापित अनुष्ठान है। चारों आयुधों में यह अकेला है जिसे इतनी स्वतंत्र पहचान मिली।
कौमोदकी गदा: शक्ति, जो टिकी रहती है
गदा का नाम कौमोदकी है और वह प्रायः निचले हाथ में, ज़मीन पर या कमर के पास टिकी हुई दिखाई जाती है। मूर्तियों में उसे उठा हुआ, प्रहार की मुद्रा में, लगभग कभी नहीं दिखाया जाता। यह चुनाव संयोग नहीं है। चारों वस्तुओं में गदा सबसे भारी है, सबसे कच्ची है, और सबसे कम कलात्मक। वह बुद्धि या सटीकता का नहीं, सीधे बल का प्रतीक है।
प्राचीन मूर्तिकला में एक परंपरा रही है जिसे आयुधपुरुष कहते हैं, जिसमें देवता के अस्त्रों को मनुष्य रूप में गढ़कर उनके पास खड़ा दिखाया जाता है। ऐसी मूर्तियों में चक्र पुरुष आकृति बन जाता है और गदा स्त्री आकृति, जिसे गदादेवी कहा गया। परंपरा ने बल को महज़ औज़ार नहीं, एक व्यक्तित्व माना, जो अपनी मर्ज़ी से नहीं उठता।
टिकी हुई गदा जो बात कहती है वह संयम है। शक्ति का होना और शक्ति का चलना, दोनों अलग चीज़ें हैं। विष्णु की भूमिका पालन की है, विनाश की नहीं, इसलिए उनका सबसे भारी अस्त्र उपलब्ध तो है पर विश्राम में है। यह उस विचार का सीधा चित्र है कि असली ताकत उसे इस्तेमाल कर लेने में नहीं, यह तय कर पाने में है कि उसे कब इस्तेमाल नहीं करना।
पद्म: कीचड़ में जड़ें, ऊपर बेदाग
चौथी वस्तु कमल है, और चारों में वही अकेली है जो न अस्त्र है, न वाद्य। उसे प्रायः ढीले हाथ में, हल्के से थामा हुआ या आगे बढ़ाया हुआ दिखाया जाता है। पकड़ में जो अंतर है वह अर्थ में भी है।
कमल की जड़ें तालाब की तलहटी की कीचड़ में होती हैं, तना गंदले पानी से होकर ऊपर आता है, और फूल सतह के ऊपर खिलता है जिस पर न कीचड़ चिपकता है न पानी ठहरता है। यह छवि भारतीय चिंतन में इतनी बार दोहराई गई है कि वह लगभग एक कहावत बन चुकी है, पर उसका मूल आशय आज भी काम का है: शुद्धता का अर्थ संसार से दूर भाग जाना नहीं, उसके भीतर रहते हुए उससे परिभाषित न होना है। विष्णु की भूमिका सृष्टि से अलग हो जाने की नहीं, उसे संभाले रखने की है, इसलिए उनके हाथ में यही फूल सबसे ठीक बैठता है।
कमल के साथ एक सृष्टि-कथा भी जुड़ी है। वैष्णव कला की सबसे परिचित छवियों में एक वह है जिसमें शेषशायी विष्णु की नाभि से कमल निकलता है और उस पर बैठे ब्रह्मा सृष्टि रचना शुरू करते हैं। इसी से विष्णु का एक नाम पद्मनाभ बना। और यही फूल लक्ष्मी का आसन भी है, जिससे उसमें पवित्रता के साथ-साथ समृद्धि और कृपा का अर्थ भी जुड़ जाता है। एक हाथ में गदा और दूसरे में कमल रखना अपने आप में एक कथन है, बल और कोमलता एक ही देह में, एक दूसरे को रद्द किए बिना।

क्रम बदलता है, तो नाम भी बदल जाता है
मंदिर घूमते हुए आपने शायद यह देखा हो कि हर विष्णु मूर्ति में चक्र एक ही हाथ में नहीं होता। कहीं शंख ऊपर बाएं है, कहीं नीचे दाएं। यह मूर्तिकार की लापरवाही नहीं है। पुराणों और आगम ग्रंथों में वर्णित परंपरा के अनुसार इन चार वस्तुओं को चार हाथों में जितने तरीकों से रखा जा सकता है, उतने ही विष्णु के नामित स्वरूप माने गए हैं। चौबीस संभावित क्रम बनते हैं और उन्हीं से केशव, नारायण, माधव, गोविंद जैसे चौबीस नाम जुड़े हैं, जिन्हें आचमन और संध्या के समय क्रम से लिया जाता है।
यानी जिसे हम आमतौर पर एक ही मूर्ति समझते हैं, शिल्पशास्त्र की दृष्टि से वह चौबीस स्वरूपों में से कोई एक है, और पहचानने का तरीका सिर्फ यह देखना है कि किस हाथ में क्या है। क्षेत्रीय ग्रंथों में यह क्रम पूरी तरह एक जैसा नहीं मिलता, पर विचार वही रहता है, और जानकार लोग पुराने मंदिरों की दीवार पर दूर से ही बता देते हैं कि यह कौन सा स्वरूप है।
याद रखने का सरल तरीका यह है कि हर वस्तु की ज़िम्मेदारी पकड़ ली जाए। शंख आरंभ और घोषणा का, चक्र विवेक और समय का, गदा अनुशासन में रखे बल का, और कमल उस कोमलता का जो सब देखकर भी मैली नहीं होती। नाम भूल जाएं तो चलेगा, ये चार भूमिकाएं याद रहें तो किसी भी मूर्ति को पढ़ा जा सकता है।
अगली बार मंदिर की दीवार पर या घर की अलमारी में रखी छोटी सी पीतल की मूर्ति पर नज़र पड़े, तो थोड़ी देर हाथों पर रुकिए। जो सामने है वह किसी कारीगर की कल्पना भर नहीं, सैकड़ों साल पुरानी एक सोच है जिसे पत्थर और धातु में बांध दिया गया। और वह सोच कहती है कि संसार को संभाले रखने के लिए सिर्फ ताकत काफी नहीं, न सिर्फ कोमलता। दोनों एक साथ चाहिए, और उन्हें एक साथ थामे रखने के लिए ही शायद चार हाथों की कल्पना करनी पड़ी।
