सुबह की पहली किरण अभी पहाड़ की ढलान तक उतरी ही थी कि गुफा के भीतर सोया शिशु भूख से जाग गया। मां आसपास नहीं थी, शायद फल लेने नीचे उतरी होंगी। बच्चे ने बाहर देखा और क्षितिज पर उसे कुछ ऐसा दिखा जिससे भूख और तेज़ हो गई, एक बड़ा सा गोल फल, गहरा नारंगी, आकाश के किनारे टंगा हुआ। उसने हाथ फैलाए और ऊपर की ओर छलांग लगा दी। उस दिन देवताओं को पता चला कि पृथ्वी पर कोई ऐसा जन्म ले चुका है जिसके लिए आकाश की ऊंचाई कोई सीमा नहीं है।
उस एक छलांग तक पहुंचने में बरसों लगे थे। एक अप्सरा का शाप, पर्वत पर की गई लंबी तपस्या, अयोध्या के यज्ञकुंड से निकली खीर का एक भटका हुआ हिस्सा और वायुदेव का चुपचाप लिया गया निर्णय, ये सब मिलकर उस शिशु को गढ़ते हैं जिसे आगे चलकर संसार हनुमान के नाम से जानेगा। ब्यौरे अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े बदलते हैं, कहीं पर्वत का नाम बदल जाता है, कहीं वरदान देने वाले देवता का, लेकिन ढांचा वही रहता है जो वाल्मीकि रामायण की परंपरा से चला आ रहा है।
स्वर्ग से उतरी अप्सरा और वह शाप जिसके भीतर रास्ता छिपा था
यह कथा हनुमान जी के जन्म से नहीं, उनकी मां के पिछले जन्म से शुरू होती है। परंपरा कहती है कि अंजना पहले पुंजिकस्थला नाम की अप्सरा थीं, स्वर्ग की सभा में नृत्य करने वाली। किसी ऋषि की साधना में उनसे चंचलता हो गई और उन्हें वानर योनि में जन्म लेने का शाप मिला। कारण हर कथा में एक जैसा नहीं बताया जाता, कहीं यह अनजाने में हुई भूल है, कहीं जान-बूझकर की गई शरारत।
शाप के साथ छूट भी मिली, जैसा इन कथाओं में प्रायः होता है। जिस दिन वे ऐसे पुत्र को जन्म देंगी जिसका बल संसार में अनुपम हो, उसी दिन उनका मूल रूप लौट आएगा। अंजना ने वानरराज कुंजर की पुत्री के रूप में जन्म लिया और बड़ी होकर केसरी से विवाह किया, जो अपने साहस के लिए जाने जाते थे। दांपत्य सुखी था, पर वर्ष बीतते गए और गोद खाली रही।
बारह वर्ष का व्रत और वह पर्वत जो आज भी उनका नाम लिए खड़ा है
अंजना ने वही किया जो इन कथाओं की स्त्रियां अक्सर करती हैं, उन्होंने प्रार्थना के बजाय तपस्या चुनी। वे एक पर्वत पर चढ़ गईं और वहीं बैठ गईं। कुछ परंपराएं कहती हैं कि यह साधना शिव को लक्ष्य करके थी, कुछ में वे वायुदेव की उपासना करती हैं, और दक्षिण की एक धारा में मतंग ऋषि उन्हें यह व्रत बताते हैं। अवधि की गिनती में भी अंतर है, पर सबसे प्रचलित मान्यता बारह वर्ष की है।
इन वर्षों का वर्णन कथावाचक बड़े ठहराव से करते हैं। सूखे पत्ते और थोड़ा सा जल, बाकी सब त्याग। गर्मी में तपते पत्थर पर, वर्षा में खुले आकाश के नीचे। कोई चमत्कार बीच में नहीं होता, कोई देवता प्रकट होकर आश्वासन नहीं देता। यही सन्नाटा इस हिस्से को कथा का सबसे भारी हिस्सा बनाता है।
वह पर्वत कौन सा था, इस पर देश के अलग-अलग हिस्सों का अपना दावा है। महाराष्ट्र में नासिक के पास खड़ा अंजनेरी पर्वत आज भी उन्हीं के नाम से पुकारा जाता है। कर्नाटक में किष्किंधा क्षेत्र की अंजनाद्रि पहाड़ी यही मान्यता रखती है, और झारखंड के गुमला ज़िले का आंजन गांव तथा तिरुमला की पहाड़ियां भी। किसी एक को चुनकर बाकी को खारिज करने की ज़रूरत नहीं, ये दावे मिलकर बताते हैं कि कथा कितनी दूर तक फैली है।
अयोध्या का यज्ञ और खीर का वह अंश जो पर्वत तक पहुंचा
अंजना जब पर्वत पर बैठी थीं, उन्हीं दिनों अयोध्या में एक दूसरा अनुष्ठान चल रहा था। राजा दशरथ वृद्ध हो चुके थे और सिंहासन का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। ऋष्यशृंग ऋषि के निर्देशन में पुत्रकामेष्टि यज्ञ आरंभ हुआ, संतान की कामना से किया जाने वाला हवन। कथा के अनुसार यज्ञ पूर्ण होने पर अग्नि से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और राजा को पवित्र खीर से भरा पात्र सौंपकर कहा कि इसे रानियों में बांट दिया जाए।
दशरथ ने वह प्रसाद कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांटा। यहीं कथा एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है। एक चील ने खीर का कुछ अंश झपट लिया और उड़ चली, और उड़ान का रास्ता ठीक उसी पर्वत के ऊपर से गुज़रा जहां अंजना वर्षों से बैठी थीं।
वायुदेव यह सब देख रहे थे। देवताओं में वही थे जिन्होंने उस तपस्या को उसकी पूरी गहराई में महसूस किया था। चील की चोंच से खीर छूटी और वायु ने उसे इतनी कोमलता से नीचे उतारा कि वह ठीक अंजना की फैली हथेलियों में आकर ठहर गई। कई कथाओं में कहा जाता है कि उस गिरती हुई खीर में वायुदेव ने अपना अंश भी मिला दिया। अंजना ने उसे अपनी प्रार्थना का उत्तर मानकर ग्रहण किया।

केसरी का पुत्र, पवन का पुत्र
समय पूरा होने पर अंजना ने पुत्र को जन्म दिया, और वर्षों का सूनापन एक ही सुबह में खत्म हो गया। लोक व्यवहार में वह बालक केसरी का पुत्र था, केसरीनंदन, पर उसके भीतर जो शक्ति थी वह वायु से आई थी। इसी कारण लगभग हर परंपरा उन्हें वायुदेव का मानस पुत्र मानती है। पवनपुत्र और मारुति, दोनों नाम सीधे वायु की ओर संकेत करते हैं, जबकि अंजनेय मां से जुड़ा है।
इसके समानांतर एक दूसरी परंपरा भी चलती है, जो हनुमान जी को शिव का अंशावतार मानती है और वायुदेव को उस तेज तक पहुंचाने वाला माध्यम। उत्तर भारत की भक्ति परंपरा में यह मान्यता गहरी है, और भक्त इसे राम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा से जोड़कर देखते हैं।
जिस सुबह आकाश से सूर्य लगभग छिन गया
बचपन के जितने प्रसंग मिलते हैं, सब एक ही बात कहते हैं, इस बालक को किसी ने बताया ही नहीं था कि कुछ चीज़ें असंभव होती हैं। सूर्य वाला प्रसंग सबसे प्रसिद्ध है। भूख से जागे शिशु ने उगते सूर्य को पका फल समझा और उसे तोड़ने के लिए उछल पड़ा। वायु का आशीर्वाद पहले से उसके भीतर था, इसलिए वह उछाल रुकी नहीं।
सूर्यदेव ने उसे जलाया नहीं। कथा कहती है कि वायुदेव के प्रति आदर के कारण उन्होंने अपना ताप समेट लिया और उस नन्हे हाथ को अपनी ओर बढ़ते रहने दिया। पर उस दिन आकाश में सूर्य अकेले नहीं थे। वह ग्रहण का दिन था, और राहु अपने नियत क्रम से वहां पहुंचा तो उसने देखा कि एक शिशु पहले से मौजूद है। बालक ने उसे हटा दिया, शायद यह जाने बिना कि वह किसका काम बिगाड़ रहा है। अपमानित राहु सीधे इंद्र के पास गया और शिकायत की कि कोई अनजाना प्राणी उसका हिस्सा छीन रहा है।
वज्र, ठुड्डी और वह नाम जो चोट से मिला
इंद्र ऐरावत पर सवार होकर स्वयं देखने निकले। उन्हें आकाश के बीच वह दृश्य मिला जिसकी कोई व्याख्या नहीं थी, एक शिशु बिना किसी सहारे के सूर्य की ओर बढ़ रहा था। घबराहट में उन्होंने अपना वज्र चला दिया, वही अस्त्र जो महर्षि दधीचि की अस्थियों से बना था। वह ठीक शिशु की ठुड्डी पर लगा और बालक बेसुध होकर एक पर्वत शिखर पर आ गिरा।
संस्कृत में ठुड्डी को हनु कहते हैं। उस चोट के निशान ने ही उन्हें वह नाम दिया जो आगे चलकर बाकी सब नामों पर भारी पड़ा। अंजनेय, मारुति और पवनपुत्र आज भी प्रचलित हैं, पर संसार उन्हें हनुमान कहकर ही पुकारता है, और यह नाम किसी विजय से नहीं, एक घाव से आया।
जब तीनों लोकों की सांस रुक गई
वायुदेव नीचे उतरे और अपने पुत्र को रक्त से सने मुख के साथ निश्चेष्ट पड़ा देखा। इसके बाद उन्होंने वह किया जो कोई देवता नहीं करता। न युद्ध छेड़ा, न शाप दिया। वे बालक को उठाकर एक गुफा में चले गए और स्वयं को सृष्टि से पूरी तरह समेट लिया।
परंपरा में वायु केवल मौसम नहीं है, वह प्राण है। सांस अटकने लगी, यज्ञों की अग्नि बुझने लगी, और तीनों लोकों के प्राणी घंटों के भीतर छटपटाने लगे। ब्रह्मा और बाकी देवता उस गुफा तक पहुंचे। वहां जो हुआ वह विनती से ज़्यादा एक स्वीकारोक्ति थी, कि चूक उन्हीं की ओर से हुई है।
ब्रह्मा ने बालक के शरीर पर हाथ रखा और प्राण लौट आए। इसके बाद जो हुआ, वह पूरी कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। एक-एक करके देवता आगे आए और उस शिशु को वरदान देने लगे, कुछ पश्चाताप में और कुछ इस समझ में कि उन्होंने अभी-अभी किसे लगभग खो दिया था।
देवताओं ने क्या-क्या दिया
कौन सा वरदान किस देवता ने दिया, इसमें क्षेत्रीय कथाओं में हेरफेर मिलता है, पर सूची लगभग इस रूप में चलती है:
- ब्रह्मा: हर दिव्य अस्त्र से अवध्यता, ब्रह्मास्त्र सहित, और उसके बंधन से भी इच्छानुसार छूट सकने की सुविधा।
- इंद्र: ऐसा शरीर जिस पर वज्र दोबारा कोई स्थायी असर न छोड़ सके, मानो उन्होंने अपनी ही चूक को निरस्त कर दिया हो।
- सूर्यदेव: अपने तेज का एक अंश, और आगे चलकर शास्त्रों की शिक्षा देने का वचन।
- वरुण: जल से और जल से जुड़े हर अस्त्र से सुरक्षा, वह वरदान जो समुद्र लांघते समय काम आया।
- यम: उनके दंड और उनके पाश से मुक्ति, यानी सामान्य क्रम में मृत्यु उन्हें छू नहीं सकती।
- कुबेर: उनकी अपनी गदा से अभय, और युद्ध में थकान न आने का आशीर्वाद।
- विश्वकर्मा: उनके बनाए हर निर्माण और हर अस्त्र से अभेद्यता, जो लंका जैसे दुर्ग में बिना खरोंच घूमने पर समझ आती है।
- वायुदेव: स्वयं वायु से भी अधिक वेग, और इच्छानुसार आकार बदल सकने की शक्ति।
अलग-अलग पढ़ने पर हर वरदान एक शिष्टाचार जैसा लगता है। साथ रखकर पढ़िए तो ये उस प्राणी का नक्शा बना देते हैं जो आगे रामायण में दिखता है, जो समुद्र पार कर लेता है, जलती लंका से बिना जले निकल आता है और देवास्त्रों के प्रहार सहकर खड़ा रहता है। ये शक्तियां बाद में अचानक नहीं आईं, वे उसी सुबह तय हो चुकी थीं।

सूर्य की पाठशाला और वह शाप जो रामायण तक साथ चला
सूर्यदेव ने अपना वचन निभाया और हनुमान जी के गुरु बने। शिक्षा की व्यवस्था अनोखी थी, क्योंकि गुरु एक पल भी स्थिर नहीं रहते। कथा कहती है कि बालक ने आकाश में उनके रथ के आगे उल्टा चलते हुए पाठ पढ़ा, ताकि गुरु का मुख सामने रहे। इसी अवस्था में शास्त्रों का अध्ययन पूरा हुआ, और यही कारण है कि उन्हें केवल बलशाली नहीं, महापंडित भी कहा जाता है।
पर बचपन शरारत से खाली नहीं रहा। अब लगभग अजेय हो चुका बालक आश्रमों में घुसकर ऋषियों की सामग्री बिखेर देता, यज्ञ में विघ्न डाल देता। ऋषियों ने अंततः एक शाप दिया, दंड से ज़्यादा अंकुश की तरह, कि हनुमान अपनी शक्तियां भूल जाएंगे और तभी याद कर पाएंगे जब कोई उन्हें याद दिलाएगा। यही सूत्र आगे रामायण के सबसे बड़े क्षणों में से एक को संभव बनाता है, जब समुद्र के किनारे पूरी वानर सेना ठिठकी खड़ी है और जामवंत उन्हें उनका अपना बल याद दिलाते हैं। तभी वे उठते हैं, और लंका तक की छलांग लगती है।
मंदिरों में सिंदूर चढ़ी जो मूर्ति खड़ी दिखती है, गदा उठाए या हाथ जोड़े, उसके पीछे यही पूरी कथा सांस लेती है। वरदान बताते हैं कि वह बल कहां से आया, पर बल इस कथा का केंद्र नहीं है। केंद्र में वह स्त्री है जो बारह वर्ष तक एक पत्थर पर बैठी रही, और वह पिता है जिसने पुत्र की चोट पर पूरे संसार की सांस रोक दी। राम के प्रति हनुमान जी की जो अटूटता आगे दिखती है, उसकी नींव कहीं न कहीं यहीं पड़ी थी, उस घर में जहां प्रतीक्षा और स्नेह, दोनों अपनी आखिरी सीमा तक जाकर लौटे थे।



