लक्ष्मी: सौभाग्य की देवी और उनका वास्तविक स्वरूप

घर की तिजोरी के ऊपर, दुकान के गल्ले के पीछे, नए बहीखाते के पहले पन्ने पर, लक्ष्मी की तस्वीर लगभग हमेशा वहीं टँगी मिलती है जहाँ पैसा रखा जाता है। इस आदत से एक धारणा इतनी गहरी बैठ गई है कि उस पर सवाल ही नहीं उठता, लक्ष्मी माने धन की देवी, बात खत्म। दिवाली की रात जो प्रार्थना सबसे ज्यादा दोहराई जाती है, वह भी घूम-फिरकर आमदनी, कारोबार और बरकत पर आकर रुक जाती है।

पर जिस शब्द से उनका पूरा परिचय बनता है, वह है श्री, और संस्कृत में श्री का दायरा रुपये-पैसे से कहीं आगे तक जाता है। श्री में चमक है, शुभता है, वह भरा-पूरापन है जिसे देखकर लगता है कि यहाँ जीवन ठीक चल रहा है। मंदिरों की मूर्तिकला, श्री सूक्त की पंक्तियाँ और पुराणों की कथाएँ मिलकर उन्हें आठ अलग-अलग रूपों में गिनाती हैं, जिनमें साहस भी है, अन्न भी, संतान भी, विद्या भी और विजय भी। सोने के सिक्के उस सूची का एक हिस्सा हैं, पूरी सूची नहीं।

श्री का दायरा और लक्ष्मी का असली क्षेत्र

हिंदू परंपरा की तीन प्रमुख देवियों में लक्ष्मी एक हैं। सरस्वती का क्षेत्र विद्या, वाणी और कला माना जाता है, पार्वती या दुर्गा का क्षेत्र शक्ति और रक्षा, और लक्ष्मी का वह सब जिसे परंपरा श्री कहती है। कागज पर यह बँटवारा जितना साफ लगता है, व्यवहार में उतना है नहीं। तीनों के क्षेत्र कई जगह एक-दूसरे में घुल जाते हैं, और अष्ट लक्ष्मी की सूची देखते ही यह बात खुद ब खुद सामने आ जाती है।

कमल उनका सबसे टिकाऊ चिह्न है और वह महज सजावट नहीं है। कमल की जड़ें कीचड़ में रहती हैं, डंठल पानी को चीरता है, और फूल सतह के ऊपर बिना किसी दाग के खिलता है। परंपरागत व्याख्या इसी को समृद्धि का स्वभाव मानती है, यानी मेहनत और गंदगी में जड़ें, पर उससे लिपटी हुई नहीं। यही वजह है कि उन्हें खिले कमल पर बैठा या खड़ा दिखाया जाता है, हाथ से सिक्के बरसाते हुए, और अक्सर दोनों ओर हाथी जल चढ़ाते हुए।

एक और नाम है जो कम लिया जाता है, चंचला। परंपरा उन्हें एक जगह न टिकने वाली मानती है, और यह विशेषण डराने के लिए नहीं, चेताने के लिए है। समृद्धि आती है और चली भी जाती है, उसे रोके रखने के लिए जिस चीज़ की जरूरत है वह भाग्य नहीं, आचरण है। पुराने ग्रंथों में बार-बार यह बात दोहराई जाती है कि लक्ष्मी वहाँ नहीं ठहरतीं जहाँ अहंकार, आलस्य या अन्याय हो।

क्षीरसागर से प्राकट्य

लक्ष्मी की उत्पत्ति की जो कथा सबसे ज्यादा सुनाई जाती है, वह जन्म की नहीं, प्राकट्य की है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार वे किसी माता की गोद में नहीं आईं, बल्कि समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर की लहरों से पूर्ण रूप में प्रकट हुईं।

कथा का ढाँचा इस तरह है। एक श्राप के कारण देवता अपना तेज और बल खो बैठे थे, और असुरों के सामने टिक पाना उनके लिए मुश्किल हो गया था। विष्णु ने उन्हें सुझाव दिया कि अमृत पाने के लिए असुरों से संधि करके समुद्र मंथन किया जाए। मंदराचल पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी बने, और एक ओर देवता, दूसरी ओर असुर लग गए। मंथन से अमृत तुरंत नहीं निकला। पहले हलाहल विष उठा, इतना भयानक कि सृष्टि को बचाने के लिए शिव ने उसे कंठ में रोक लिया, और यहीं से उनका नाम नीलकंठ पड़ा।

विष के बाद सागर ने एक-एक करके अपने रत्न दिए, कामधेनु, पारिजात, ऐरावत, चंद्रमा, और फिर स्वयं लक्ष्मी, कमल पर विराजमान, हाथ में कमल लिए। कहा जाता है कि उस क्षण मंथन थम गया, दोनों पक्ष रस्सी छोड़कर बस देखते रह गए। उन्होंने उसी सभा में विष्णु को वरमाला पहनाई। कुछ पुराणों में उनसे पहले उनकी बड़ी बहन के रूप में ज्येष्ठा या अलक्ष्मी के प्रकट होने का वर्णन भी मिलता है, जिन्हें दरिद्रता और अशुभता से जोड़ा गया है।

यह जोड़ना जरूरी है कि मंथन का क्रम हर पुराण में एक जैसा नहीं है। कौन सा रत्न कब निकला, कितने रत्न निकले, किसे क्या मिला, इन ब्योरों में भागवत, विष्णु पुराण और महाभारत के विवरण आपस में मेल नहीं खाते। ऐसे में किसी एक श्लोक का हवाला देकर सटीक क्रम गिनाना ईमानदारी नहीं होगी। जो हर पाठ में एक जैसा रहता है वह इतना ही है, अमृत की खोज, पहले विष, फिर रत्न, और सबसे बड़े रत्न के रूप में लक्ष्मी।

राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई देवी लक्ष्मी की चित्रकारी, कमल पर विराजमान, 1896
चित्र: राजा रवि वर्मा, 1896 / विकिमीडिया कॉमन्स, पब्लिक डोमेन

विष्णु के साथ की जोड़ी

लक्ष्मी ने प्रकट होते ही विष्णु को चुना, इसलिए परंपरा इस संबंध को बाद में तय हुआ कोई विवाह नहीं मानती। इसे सृष्टि की बनावट में पहले से मौजूद एक जोड़ी की तरह देखा जाता है। विष्णु का काम पालन और रक्षा है, और यह काम बिना संसाधन, बिना अन्न, बिना समृद्धि के हो ही नहीं सकता। दूसरी ओर समृद्धि को टिकने के लिए व्यवस्था चाहिए, वरना वह लूट में बदल जाती है। दोनों में से किसी एक को बड़ा बताना इस चित्र को समझने में मदद नहीं करता।

यही सोच अवतारों तक फैली हुई है। मान्यता है कि विष्णु जब भी किसी रूप में उतरे, लक्ष्मी उसी के अनुरूप रूप में साथ आईं। राम के साथ सीता, वामन के साथ पद्मा, कृष्ण के साथ रुक्मिणी। राधा को लक्ष्मी का स्वरूप मानने की परंपरा भी है, हालाँकि वह हर संप्रदाय में एक जैसी स्वीकार्य नहीं है और वैष्णव शाखाओं में इस पर मत अलग-अलग हैं।

मंदिरों में यह जोड़ी और भी साफ दिखती है। तिरुपति के वेंकटेश्वर के साथ पद्मावती, श्रीरंगम के रंगनाथ के साथ रंगनायकी, और लगभग हर बड़े वैष्णव परिसर में एक अलग लक्ष्मी सन्निधि। श्रीवैष्णव परंपरा तो एक कदम और आगे जाती है, वहाँ भक्त सीधे विष्णु तक नहीं, लक्ष्मी के माध्यम से पहुँचता है, क्योंकि वे सिफारिश करने वाली मानी जाती हैं। इस भूमिका को पुरुषकार कहा जाता है।

अष्ट लक्ष्मी: आठ रूप, आठ तरह की समृद्धि

असली चौंकाने वाली बात यहाँ है। अष्ट लक्ष्मी स्तोत्र, जो दक्षिण भारत के मंदिरों में रोज पढ़ा जाता है, उनके आठ रूप गिनाता है, और इनमें से मुश्किल से दो का सीधा वास्ता पैसे से है। बाकी छह उन चीज़ों से जुड़े हैं जिनके बिना पैसा किसी काम का नहीं रहता।

  • आदि लक्ष्मी, मूल स्वरूप, वही जो सागर से प्रकट हुई थीं। बाकी सात रूप इन्हीं से निकलते हैं। इन्हें रमा भी कहा जाता है, और इनका क्षेत्र किसी खास लाभ से ज्यादा उस बुनियादी जीवन-शक्ति के करीब है जिससे बाकी सब संभव होता है।
  • धन लक्ष्मी, धन और भौतिक संपत्ति की अधिष्ठात्री। वही रूप जो सबसे पहले याद आता है। ध्यान देने की बात यह है कि परंपरा यहाँ भी धन को कमाने और लगाने की चीज़ मानती है, जमा करके बैठ जाने की नहीं।
  • धान्य लक्ष्मी, अन्न और खेती की देवी। जिस समाज में यह सूची बनी, वहाँ भरा हुआ अनाज का कोठार तिजोरी से ज्यादा भरोसेमंद था। अकाल में सोना खाया नहीं जाता।
  • गज लक्ष्मी, पशुधन और राजसी वैभव का रूप। इन्हें दोनों ओर से हाथियों द्वारा जल अर्पित करते हुए दिखाया जाता है, जो उर्वरता और राजशक्ति दोनों का संकेत है। गाय, हाथी, घोड़े, यानी वह चलती-फिरती संपत्ति जिससे खेती और सेना दोनों चलती थीं।
  • संतान लक्ष्मी, संतान और वंश की निरंतरता। संतान की कामना से इनकी पूजा होती है। यह रूप समृद्धि को सीधे अगली पीढ़ी से जोड़ देता है, न कि किसी संचय से।
  • वीर लक्ष्मी, जिन्हें धैर्य लक्ष्मी भी कहते हैं, साहस और डटे रहने की ताकत। इनका धन से कोई सीधा रिश्ता नहीं। किसी कठिन काम, मुकदमे, परीक्षा या संघर्ष से पहले इनका स्मरण किया जाता है।
  • विजय लक्ष्मी, सफलता की देवी, खासकर वह सफलता जो लगातार प्रयास से आती है। किसी बड़े दायित्व, यात्रा या अभियान की शुरुआत में इन्हें पुकारने की परंपरा रही है।
  • विद्या लक्ष्मी, ज्ञान, शिक्षा और कलाओं की अधिष्ठात्री। यह वही क्षेत्र है जो आम तौर पर सरस्वती का माना जाता है, और यह ओवरलैप बताता है कि व्यवहार में इन देवियों की सीमाएँ कितनी आपस में मिली हुई हैं।
गज लक्ष्मी की 19वीं सदी की पहाड़ी शैली की चित्रकारी, हाथियों से घिरी हुई, कांगड़ा कला संग्रहालय
चित्र: गज लक्ष्मी, 19वीं सदी, नूरपुर शैली, पहाड़ी कलम / विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 4.0

सूची हर जगह एक जैसी क्यों नहीं मिलती

अगर आप दो अलग मंदिरों में या दो अलग किताबों में यह सूची पढ़ें, तो नाम पूरी तरह मेल नहीं खाएँगे। कहीं विद्या लक्ष्मी की जगह ऐश्वर्य लक्ष्मी मिलेंगी, कहीं दोनों अलग-अलग गिनी जाती हैं और आदि लक्ष्मी को सूची से बाहर रखकर मूल स्रोत माना जाता है। सौभाग्य लक्ष्मी और वर लक्ष्मी जैसे नाम भी कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में इस आठ की गिनती में आ जाते हैं।

यह कोई गड़बड़ी नहीं है। आठ की संख्या भारतीय परंपरा में पूर्णता का संकेत देती है, जैसे अष्टदिक्पाल या अष्टसिद्धि, और अलग-अलग क्षेत्रों ने अपनी जरूरत के हिसाब से इस ढाँचे में नाम रखे। जिस इलाके में खेती केंद्र में थी, वहाँ धान्य लक्ष्मी का जोर रहा, जहाँ व्यापार था वहाँ धन लक्ष्मी का। सूची का मकसद नामों की सूची बनाना नहीं, यह कहना है कि समृद्धि एक चीज़ नहीं, कई चीज़ों का जोड़ है।

पूजा के तरीके और वे संकेत जो अक्सर छूट जाते हैं

शुक्रवार उनका दिन माना जाता है, और कई घरों में हफ्ते में एक बार दीया, ताजे फूल और कुछ मीठा चढ़ाकर छोटी सी पूजा हो जाती है। सबसे बड़ा आयोजन दिवाली की रात होता है, जब दरवाजे खुले रखे जाते हैं और देहरी पर दीये जलाए जाते हैं। इसके पीछे की मान्यता सीधी है, वे उसी घर में रुकती हैं जो साफ हो, रोशन हो और स्वागत करता हो, और अँधेरे या बिखरे हुए घर से आगे बढ़ जाती हैं। दक्षिण भारत में श्रावण के एक शुक्रवार को होने वाला वरलक्ष्मी व्रत केवल धन नहीं, उनके कई रूपों को एक साथ संबोधित करता है।

उनका वाहन उल्लू बताया जाता है, जो पहली नजर में अजीब लगता है। उल्लू अँधेरे में देख सकता है, और इसी से जुड़ी व्याख्या यह है कि जहाँ बाकी सब को कुछ नहीं सूझता, वहाँ विवेक काम आता है। कुछ परंपराएँ इसे उलटकर पढ़ती हैं, कि उल्लू दिन में अंधा रहता है, यानी धन के पीछे भागने वाला अक्सर सामने की चीज़ भी नहीं देख पाता। दोनों पाठ प्रचलित हैं और दोनों एक ही तरफ इशारा करते हैं।

यह भी ध्यान देने लायक है कि पूजा में उन्हें अकेले कम ही रखा जाता है। दिवाली पर गणेश साथ बैठते हैं, कहीं सरस्वती भी। तीनों का साथ होना एक व्यावहारिक बात कहता है, बुद्धि, विद्या और समृद्धि को अलग-अलग माँगने से काम नहीं चलता।

लक्ष्मी को धन की देवी कहना गलत नहीं है, धन लक्ष्मी उनका एक सच्चा और केंद्रीय रूप है। बस इतना है कि उस एक नाम पर रुक जाने से बाकी सात छूट जाते हैं, और उनके साथ वह पूरी समझ भी छूट जाती है जो सदियों में बनी थी। जिस परिवार में पैसा हो पर संतान न हो, जिस राज्य के खजाने भरे हों पर सैनिकों में हिम्मत न हो, जिस घर में कमाई हो पर पढ़ाई न हो, परंपरा उसे समृद्ध नहीं मानती थी। आठ रूपों की यह गिनती दरअसल एक पूरी जिंदगी की चेकलिस्ट है, और कैलेंडर पर छपी उस तस्वीर से कहीं ज्यादा कहती है जिसे हम रोज बिना ध्यान दिए देखते रहते हैं।

Dakshyani Editorial

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