सुंदरकांड: लंका तक हनुमान की समुद्र पार छलांग

महीनों की भटकन के बाद वानरों की टोली दक्षिण के उस छोर पर आकर रुक गई थी जहाँ से आगे धरती बची ही नहीं थी। सामने सिर्फ़ पानी था, और उस पानी का दूसरा किनारा आँख से दिखाई नहीं देता था। जिस रानी को खोजने वे निकले थे उसका ठिकाना तो मिल चुका था, पर उस ठिकाने के साथ एक ऐसी दूरी जुड़ी हुई थी जिसे नापने की हिम्मत बड़े से बड़े योद्धा में नहीं बची थी। कोई कहता कि वह बीस योजन तक जा सकता है, कोई तीस तक, कोई पचास तक। लौटने की बात कोई नहीं कर पाता था।

फिर एक बूढ़े रीछ ने भीड़ में बैठे उस वानर की ओर देखा जो अब तक चुप था, और उसे उसका अपना परिचय याद दिलाया। उसके बाद जो हुआ वह रामायण का सबसे बार-बार सुनाया जाने वाला प्रसंग है, और सुंदरकांड नाम के उस अध्याय की शुरुआत भी, जिसे आज भी लाखों घरों में पूरे महाकाव्य से अलग करके अकेले पढ़ा जाता है।

तट पर छाई हुई चुप्पी और जामवंत का स्मरण

गिद्धराज संपाति से यह पता चल चुका था कि सीता लंका में हैं, रावण की नगरी में, अशोक वाटिका के पेड़ों के बीच बंदी। खोज का सबसे कठिन हिस्सा पूरा हो गया था, और ठीक उसी क्षण सामने सौ योजन चौड़ा समुद्र आ खड़ा हुआ। अंगद ने साफ़ कहा कि वे उस पार तो पहुँच जाएँगे, पर वापस लौट पाएँगे इसका भरोसा नहीं दे सकते। सबसे भारी चुप्पी सेनापति की थी, क्योंकि आगे का रास्ता उसे सुझाना था और सुझाने को कुछ बचा नहीं था।

जामवंत उस सभा में सबसे बूढ़े थे और सबसे ज़्यादा देख चुके थे। उन्होंने किसी को आदेश नहीं दिया, किसी को ललकारा भी नहीं। वे बस हनुमान के पास जाकर बैठ गए और उन्हें उनका अपना बचपन सुनाने लगे। वायु के पुत्र होने की बात, सूरज को पका हुआ फल समझकर आकाश की ओर उछल पड़ने की बात, और वह बात भी कि ऋषियों ने उस बेकाबू बालक की शक्ति देखकर उसे ऐसा बना दिया था कि अपना बल वह खुद भूल जाए, जब तक कोई उसे याद न दिलाए। कुछ परंपराएँ इसे शाप कहती हैं, कुछ इसे संसार की रक्षा का उपाय मानती हैं। जो भी रहा हो, उस दिन तट पर उसका असर टूटा। हनुमान सुनते रहे, और सुनते-सुनते उठ खड़े हुए।

महेंद्र पर्वत पर बढ़ता हुआ शरीर

वे चलकर महेंद्र पर्वत पर चढ़े, उस पर्वत पर जिसके सिरे से आगे केवल खुला समुद्र था। वाल्मीकि रामायण की परंपरा के अनुसार वहीं उनका शरीर बढ़ना शुरू हुआ। पहले कंधे चौड़े हुए, फिर छाती, फिर पूरा डील इस तरह फैला कि शिखर पर खड़ा वानर खुद पर्वत जितना ऊँचा दिखने लगा। पूँछ ऊपर उठकर लहराने लगी, आँखें दहकने लगीं, साँस इतनी गहरी हो गई कि आसपास के पेड़ हिलने लगे। नीचे खड़े वानरों ने पहली बार अपनी आँखों से देखा कि जिस साथी के साथ वे महीनों जंगल-जंगल भटके थे, वह असल में है क्या।

पर्वत से यह बोझ सहा नहीं गया। चट्टानें चरमराईं, झरने अपनी धार से हट गए, गुफाओं में सोए जानवर चीखते हुए बाहर भागे। हनुमान ने पैर जमाए, हाथ जोड़कर अपने पिता वायु को प्रणाम किया, राम का नाम लिया, और शरीर को एक बार पीछे की ओर समेटा, ठीक वैसे ही जैसे छोड़ने से पहले धनुष की डोरी खींची जाती है।

एक छलांग, और पीछे छूटता हुआ किनारा

फिर वह छलांग लगी। धक्के से महेंद्र पर्वत थोड़ा धँस गया, उसके पेड़ जड़ समेत उखड़कर हनुमान के पीछे-पीछे हवा में खिंच गए, और तट पर खड़ी सेना के ऊपर से धूल, पत्तों और फूलों की आँधी गुज़र गई। उखड़े हुए पेड़ कुछ दूर तक उनके पीछे उड़ते रहे, फिर एक-एक करके समुद्र में गिर गए।

आगे का वर्णन उड़ान जैसा नहीं है, साधे हुए बाण जैसा है। बाँहें आगे फैली हुईं, शरीर सीधा, पूँछ पीछे तनी हुई। नीचे समुद्र उनके गुज़रने के दबाव से मथ उठता है, मछलियाँ और बड़े जलचर पानी की सतह पर उछल आते हैं, और छाया इतनी बड़ी पड़ती है कि लहरों पर एक चलता हुआ काला द्वीप दिखाई देने लगता है। यहीं से यात्रा का वह हिस्सा शुरू होता है जिसमें एक के बाद एक तीन शक्तियाँ उनका रास्ता रोकती हैं, और हर बार परीक्षा का स्वरूप अलग होता है।

मंडपम, तमिलनाडु तट के पास हनुमान की प्रतिमा, लंका की ओर उनकी छलांग के पारंपरिक स्थल के निकट
Photo: Guptaprasad08 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मैनाक का न्योता और एक विनम्र इनकार

पहली रुकावट रुकावट थी ही नहीं। बीच समुद्र में लहरों के नीचे मैनाक नाम का एक पर्वत दबा पड़ा था। पुरानी कथा यह है कि किसी समय पर्वतों के पंख हुआ करते थे और वे मनमाने ढंग से उड़कर बस्तियों पर उतर जाते थे, इसलिए इंद्र ने अपने वज्र से उनके पंख काट डाले। वायु ने उस दौड़ में मैनाक को उठाकर समुद्र की गहराई में छिपा दिया और उसके प्राण बचा लिए। पर्वत ने वह उपकार कभी नहीं भुलाया।

अब जब वायु का ही बेटा उसी समुद्र के ऊपर से गुज़र रहा था, मैनाक को अपना कर्ज़ चुकाने का अवसर दिखा। वह पानी चीरता हुआ ऊपर उठा, अपना सुनहरा शिखर हनुमान के सामने रख दिया और अनुरोध किया कि थोड़ी देर बैठ लीजिए, कुछ फल खा लीजिए, आगे का रास्ता लंबा है। हनुमान ने उसे टालने के बजाय हथेली से उसका शिखर छू भर लिया, यही उनका आभार था। फिर उन्होंने कहा कि जब तक राम का काम पूरा नहीं होता, तब तक विश्राम का कोई अर्थ नहीं। बिना गति धीमी किए वे आगे बढ़ गए, और पीछे छूटता मैनाक उन्हें जाते हुए देखता रह गया। कथावाचक अक्सर इसी छोटे से प्रसंग पर रुकते हैं, क्योंकि पूरे सुंदरकांड का स्वभाव यहीं तय हो जाता है, आदर के साथ इनकार और काम पर टिकी हुई नज़र।

सुरसा का खुला हुआ मुँह

दूसरी परीक्षा जानबूझकर भेजी गई थी। परंपरा के अनुसार देवताओं ने यह देखना चाहा कि यह वानर सचमुच उतना ही समर्थ है या केवल उत्साह में उड़ा जा रहा है, और उन्होंने नागों की माता सुरसा से निवेदन किया कि वे इसे परखें। सुरसा समुद्र से उठीं, विकराल रूप में हनुमान का मार्ग रोका और शर्त रख दी कि आगे जाना है तो पहले उनके मुँह में प्रवेश करना होगा।

हनुमान ने बहस नहीं की। उन्होंने पहले सच्चाई से अपना काम बताया और लौटते हुए स्वयं उनके मुँह में आ जाने का वचन देना चाहा। सुरसा नहीं मानीं। तब उन्होंने अपना शरीर बढ़ाना शुरू किया, और सुरसा ने अपना मुँह उतना ही चौड़ा किया। यह होड़ कुछ देर चली, फिर हनुमान ने अचानक दिशा बदल दी। वे पल भर में अँगूठे जितने छोटे हो गए, बिजली की तेज़ी से उस विशाल मुँह के भीतर गए और जबड़ा बंद होने से पहले बाहर आ गए। शर्त पूरी हो चुकी थी, वचन भी निभ गया था, और यात्रा का एक क्षण भी बर्बाद नहीं हुआ। सुरसा ने अपना असली रूप प्रकट किया, उन्हें आशीर्वाद दिया और रास्ता छोड़ दिया। इस प्रसंग को हिंदू परंपरा में बल से ज़्यादा बुद्धि की जीत के उदाहरण के तौर पर सुनाया जाता है।

छाया पकड़ने वाली सिंहिका

तीसरा हमला बिना किसी चेतावनी के हुआ और यही सबसे खतरनाक निकला। समुद्र में सिंहिका नाम की एक राक्षसी रहती थी जिसकी शिकार करने की विधि अनोखी थी। वह ऊपर से गुज़रते जीव की छाया को पानी पर पकड़ लेती थी, और छाया खिंचते ही उसका मालिक भी नीचे खिंच आता था। हनुमान को पहले यह समझ ही नहीं आया कि हो क्या रहा है। शरीर में पूरी शक्ति थी, हवा भी अनुकूल थी, फिर भी वे नीचे की ओर खिंचते जा रहे थे, जैसे किसी ने अदृश्य रस्सी बाँध रखी हो। सामने लड़ने के लिए कोई शत्रु था ही नहीं।

फिर उनकी नज़र नीचे गई और उन्हें अपनी छाया पर जमी हुई पकड़ दिखाई दी। समझ आते ही उन्होंने कुछ भी टालने की कोशिश नहीं की। उन्होंने खुद को छोटा किया और सीधे उसी खुले मुँह में उतर गए, पर इस बार निकलने के लिए नहीं। भीतर पहुँचकर उन्होंने उसके अंग चीर डाले और शरीर फाड़कर बाहर निकल आए। सिंहिका लहरों में गिरी और समुद्र का पानी कुछ देर के लिए लाल हो गया। हनुमान ने इसे कोई बड़ी विजय नहीं माना। उन्होंने फिर अपना पूरा रूप लिया और उसी दिशा में आगे बढ़ गए, जैसे यह भी रास्ते का एक साधारण पत्थर रहा हो।

रामेश्वरम तट से मन्नार की खाड़ी का दृश्य, समुद्र का वह हिस्सा जो पारंपरिक रूप से लंका तक हनुमान की यात्रा से जोड़ा जाता है
Photo: Swarnav999 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

क्षितिज पर उभरती सोने की नगरी

आख़िरकार पानी के उस पार हरियाली दिखी, फिर पहाड़, और फिर पहाड़ों के बीच बसा वह नगर जिसकी दीवारें दूर से ही चमक रही थीं। हनुमान लंबे तट के पास एक ऊँची चोटी पर उतरे, साँस सँभाली और सामने फैले दृश्य को देखा। वाल्मीकि रामायण की परंपरा में लंका का वर्णन विस्मय के साथ आता है, ऊँची प्राचीरें, चौड़े राजमार्ग, पहरेदारों से भरे द्वार, सजे हुए उपवन, संगीत और उत्सव से भरी रातें। यह किसी उजाड़ राक्षस-भूमि का चित्र नहीं, एक समृद्ध और सुव्यवस्थित राजधानी का चित्र है।

हनुमान समझ गए कि इस रूप में द्वार से भीतर जाना पकड़े जाने का सीधा रास्ता है। उन्होंने अपने को इतना छोटा कर लिया कि किसी की नज़र में न आएँ, और रात होने की प्रतीक्षा की। आगे जो कुछ होता है, नगर की तलाशी, अशोक वाटिका में सीता से भेंट, अक्षय कुमार से युद्ध और अंत में जलती पूँछ से लंका का दहन, वह सुंदरकांड का शेष हिस्सा है। पर पूरे अध्याय की रीढ़ यही समुद्र-यात्रा है, क्योंकि उसी में तय हो जाता है कि यह दूत किस मिट्टी का बना है।

सुंदरकांड अकेले क्यों पढ़ा जाता है

रामायण के सात कांडों में सुंदरकांड की जगह अलग है। बाकी कांड कथा के प्रवाह में एक-दूसरे से बँधे रहते हैं, पर यह एक ऐसा हिस्सा है जिसे लोग अलग निकालकर, अपने आप में पूरा मानकर पढ़ते हैं। घरों में अखंड पाठ होते हैं, मंगलवार और शनिवार को मंडलियाँ बैठती हैं, और परीक्षा, मुकदमे, बीमारी या किसी नए काम की शुरुआत से पहले इसका पाठ रखा जाता है। मान्यता यह है कि इसके पढ़ने से साहस मिलता है और अटके हुए काम खुलते हैं।

इस नाम को लेकर भी एक से ज़्यादा व्याख्याएँ चली आती हैं। कुछ परंपराएँ मानती हैं कि सुंदर हनुमान का ही विशेषण है, इस कांड के उस नायक का जो जिस काम में हाथ डालता है उसे बिना चूक पूरा करता है। कुछ इसे लंका के वर्णित सौंदर्य से जोड़ते हैं, और कई विद्वान वाल्मीकि की काव्य-भाषा से, जो इस कांड में सबसे निखरी हुई मानी जाती है। ये व्याख्याएँ आपस में लड़ती नहीं, और कथा-परंपराएँ इस सवाल को सुलझाए बिना कई उत्तर साथ-साथ स्वीकार करती रही हैं। तुलसीदास की रामचरितमानस में यही प्रसंग अवधी में अपने ढंग से आता है और कुछ विवरण वाल्मीकि से अलग हैं, जैसा क्षेत्रीय कथाओं में स्वाभाविक है।

असली कारण शायद इससे भी सीधा है। इस कांड से पहले पूरी कथा खोने की कथा है, राज्य छूटा, वन मिला, पत्नी हरी गई, और खोज महीनों तक बिना नतीजे के चलती रही। सुंदरकांड वह मोड़ है जहाँ पहली बार कोई अच्छी खबर आती है। सीता जीवित मिलती हैं, उनका ठिकाना पक्का हो जाता है, और युद्ध की योजना कल्पना से निकलकर संभावना बन जाती है। किसी लंबे और थका देने वाले दौर से गुज़र रहे व्यक्ति को इस कांड में वही मिलता है जिसकी उसे ज़रूरत है, यह भरोसा कि एक अकेला जीव ठीक समय पर अपनी शक्ति याद कर ले तो सामने पड़ा समुद्र भी पार हो जाता है। महेंद्र पर्वत पर लगी वह एक छलांग सदियों से यही बात दोहरा रही है।

Dakshyani Editorial

The editorial team at Dakshyani researches and writes accessible guides to Indian mythology, temples, festivals, and living traditions.

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