आरती के दौरान क्या होता है और इसे क्यों किया जाता है

शाम ढलते ही घर के कोने में बने छोटे से मंदिर के सामने कुछ मिनटों के लिए सब कुछ ठहर जाता है। कोई थाली में दीया जमाता है, कोई घंटी उठा लेता है, और अगले पाँच मिनट तक रसोई की खटपट, टीवी की आवाज़, फ़ोन की स्क्रीन, सब पीछे चले जाते हैं। यही छोटा सा दृश्य देश भर के करोड़ों घरों में रोज़ दोहराया जाता है। और यही दृश्य वाराणसी के दशाश्वमेध घाट या हरिद्वार की हर की पौड़ी पर सैकड़ों गुना बड़े पैमाने पर भी दिखता है, जहाँ बहुस्तरीय पीतल के दीपक हवा में गोल घूमते हैं और नदी किनारे बैठे हज़ारों लोग एक ही लय में बँध जाते हैं।

पर इतनी रोज़मर्रा की चीज़ होने के बावजूद इसका ढाँचा बेतरतीब नहीं है। दीपक किस दिशा में घूमेगा, घंटी कब से बजेगी और कब तक बजती रहेगी, थाली में क्या-क्या रखा जाएगा, लौ आख़िर में भक्तों तक क्यों पहुँचाई जाएगी, इन सबके पीछे एक तय समझ चली आ रही है जिसे ज़्यादातर लोग बिना सोचे निभाते तो हैं, पर बता नहीं पाते। थोड़ा ठहरकर देखें तो आरती इशारों का समूह नहीं, बल्कि क्रम में सजा हुआ एक पूरा विचार लगने लगती है।

आरती शब्द अपने आप में क्या कहता है

शब्द की जड़ को लेकर विद्वानों में एक राय नहीं है। एक व्याख्या इसे संस्कृत के आरात्रिक से जोड़ती है, जो रात्रि यानी अंधकार के समय जलाए जाने वाले दीप की ओर संकेत करती है। दूसरी व्याख्या इसे आर्ति शब्द से जोड़ती है, जिसका अर्थ पीड़ा या कष्ट होता है, और जिसके आगे लगा उपसर्ग उस पीड़ा को हटा देने का भाव देता है। दोनों ही व्याख्याएँ एक ही दिशा में जाती हैं, इसलिए व्युत्पत्ति की बहस चाहे जो हो, भाव साफ़ है: जो नहीं दिख रहा उसे दिखा देना, जो भारी पड़ रहा है उसे हल्का कर देना।

प्रकाश का यह प्रतीक भारतीय चिंतन में बहुत पुराना है। अंधकार यहाँ सिर्फ़ रोशनी की कमी नहीं, अज्ञान का रूपक भी है, और दीप उस अज्ञान के हटने का। यही विचार दिवाली की दीपमालाओं के पीछे भी है और मंदिर के गर्भगृह में जलती इकलौती बाती के पीछे भी। आरती में यह प्रतीक अपने सबसे सघन रूप में आता है, क्योंकि यहाँ दीप स्थिर नहीं रहता। वह उठता है, घूमता है, मूर्ति के चेहरे के पास जाता है, और फिर उसी रास्ते से लौटकर देखने वाले तक पहुँच जाता है।

थाली में क्या-क्या रखा जाता है और क्यों

आरती की थाली हर घर में एक जैसी नहीं होती, पर उसमें रखी जाने वाली चीज़ें ज़्यादातर एक ही सूची से आती हैं। सबसे बीच में दीपक रहता है, घी का या तिल के तेल का, जिसमें रुई की बत्तियाँ सजी होती हैं। घी को पारंपरिक रूप से अधिक शुभ माना जाता है और मंदिरों में अक्सर वही चलता है, जबकि घरों में तेल भी उतना ही सामान्य है। दीपक के साथ कपूर की टिकिया रखी जाती है, जिसकी अपनी अलग जगह है, क्योंकि कपूर जलकर पीछे कुछ नहीं छोड़ता। पारंपरिक रूप से माना जाता है कि साधक का अहंकार भी इसी तरह बिना अवशेष के जल जाना चाहिए, इसलिए कपूर की आरती को कई परंपराओं में सबसे शुद्ध अर्पण कहा गया है।

बाक़ी चीज़ें भी अपने-अपने काम से आती हैं। धूप या अगरबत्ती गंध का अर्पण है, फूल और अक्षत यानी बिना टूटे चावल के दाने रूप और समृद्धि का, जल से भरा छोटा पात्र शुद्धि का, और नैवेद्य यानी भोग स्वाद का। कई जगह चँवर या छोटा पंखा भी थाली के पास रखा रहता है, जिसे आरती के दौरान डुलाया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी सम्मानित अतिथि के आगे हवा की जाती हो। शंख और घंटी थाली में नहीं होते, पर आरती के दौरान वे उतने ही ज़रूरी हैं, क्योंकि वही ध्वनि का हिस्सा सँभालते हैं।

इन सबको एक साथ देखने पर एक बात साफ़ होती है। आरती में केवल आँख को दिखने वाली चीज़ नहीं चढ़ाई जा रही। गंध, ध्वनि, स्वाद, स्पर्श, दृष्टि, इंद्रियों के सारे रास्ते एक साथ काम में लाए जा रहे हैं। यही वजह है कि आरती में शामिल व्यक्ति को अलग से एकाग्र होने की कोशिश नहीं करनी पड़ती। ध्यान अपने आप खिंच जाता है।

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर संध्या गंगा आरती के दौरान पुजारी जलता हुआ पीतल का दीपक ऊपर उठाए हुए
Photo: Chetanbtc / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

पाँच तत्वों वाली व्याख्या, और उसकी हद

आरती को समझाने के लिए सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाला ढाँचा पंचमहाभूत का है, यानी वे पाँच तत्व जिन्हें शास्त्रीय भारतीय चिंतन में समूची सृष्टि का आधार माना गया है। कई मंदिरों में जो पाँच बातियों वाला दीपक चलता है, जिसे पंचप्रदीप कहते हैं, उसे इसी विचार से जोड़कर देखा जाता है। इस व्याख्या के अनुसार फूल, चंदन और अक्षत पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जल का पात्र जल का, दीपक की लौ अग्नि का, चँवर या पंखे से चलने वाली हवा वायु का, और घंटी, शंख तथा स्वर से बनने वाली ध्वनि आकाश का, क्योंकि आकाश को सबसे सूक्ष्म तत्व मानकर उसे कंपन से जोड़ा जाता है।

यह ढाँचा साफ़ है और याद रखने में आसान भी, पर इसे एकमात्र आधिकारिक व्याख्या मान लेना ठीक नहीं होगा। पंचप्रदीप की पाँच बातियों को कई परंपराओं में पाँच तत्वों से नहीं, बल्कि पाँच प्राणों या पाँच इंद्रियों से जोड़ा जाता है। कुछ जगह पाँच के बजाय सात या ग्यारह बातियों वाले दीपक चलते हैं, और वहाँ यह गणित अपने आप बदल जाता है। दक्षिण भारत की कर्पूर आरती, बंगाल की दुर्गा पूजा की पंचप्रदीप आरती और उत्तर भारत की सामान्य संध्या आरती, तीनों का रूप और उसके पीछे बताई जाने वाली व्याख्या एक जैसी नहीं है। इसलिए पंचमहाभूत वाली बात को एक व्यापक और सुंदर पारंपरिक व्याख्या के रूप में लेना चाहिए, न कि ऐसे नियम के रूप में जिससे बाक़ी सब ग़लत ठहर जाए।

लौ को गोल घुमाने के पीछे का तर्क

आरती का सबसे पहचाना जाने वाला हिस्सा वही धीमी गोलाकार गति है। दीपक को दक्षिणावर्त, यानी घड़ी की सुइयों की दिशा में घुमाया जाता है, वही दिशा जो मंदिर की परिक्रमा में भी अपनाई जाती है, ताकि पूजित केंद्र हमेशा दाहिनी ओर रहे। यह दिशा संयोग नहीं है, इसे आदर की मुद्रा माना गया है।

घुमाने का क्रम भी कई परंपराओं में तय है। दीपक पहले देवता के चरणों के पास कुछ बार घुमाया जाता है, फिर नाभि के पास, फिर मुख के पास, और अंत में पूरे विग्रह पर एक बड़ा वृत्त बनाया जाता है। इसका एक व्यावहारिक पक्ष भी है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। गर्भगृह प्रायः अँधेरा रहता है, और चलती हुई लौ ही वह इकलौती चीज़ है जो मूर्ति के अलग-अलग हिस्सों को बारी-बारी से उजागर करती है। भक्त जो दर्शन करता है, वह इसी घूमती रोशनी के सहारे बनता है। दृष्टि की यह स्पष्टता और भीतर की स्पष्टता, दोनों को एक ही क्षण में जोड़कर देखा जाता है।

घंटी इस पूरे समय बजती रहती है, और यह भी अकारण नहीं। ध्वनि को नाद माना गया है, और लगातार बजती घंटी बाहरी शोर तथा भीतर चलती बातचीत, दोनों को कुछ देर के लिए दबा देती है। जो लोग रोज़ आरती में शामिल होते हैं वे इस असर को पहचानते हैं। घंटी शुरू होते ही मन का बिखराव कम हो जाता है।

आरती किस क्रम में की जाती है

क्षेत्र, संप्रदाय और अवसर के हिसाब से ब्योरे बदलते हैं, पर मोटा क्रम लगभग हर जगह पहचाना जा सकता है।

  1. तैयारी। थाली सजाई जाती है, बातियाँ घी या तेल में भिगोकर दीपक में रखी जाती हैं, कपूर अलग रखा जाता है, और आरती करने वाला हाथ धोकर आसन के सामने खड़ा होता है।
  2. दीप प्रज्वलन। दीपक जलाया जाता है। कई घरों में इसी क्षण एक छोटा संकल्प या नाम स्मरण भी किया जाता है।
  3. घंटी और शंख। घंटी बजनी शुरू होती है और कई जगह शंखनाद भी होता है, जो आरती के आरंभ की घोषणा है।
  4. दीपक का घुमाना। लौ देवता के सामने दक्षिणावर्त घुमाई जाती है, चरणों से शुरू होकर मुख तक, और अंत में पूरे विग्रह पर।
  5. आरती गान। उस देवता से जुड़ा भजन गाया जाता है, प्रायः सामूहिक स्वर में, जहाँ जानी-पहचानी पंक्तियों पर सब साथ जुड़ जाते हैं।
  6. कपूर आरती। कई परंपराओं में अंत में कपूर जलाकर अलग से घुमाया जाता है, जिसकी तेज़ सफ़ेद लौ पूरे स्थान को क्षण भर के लिए भर देती है।
  7. लौ का भक्तों तक जाना। दीपक उपस्थित लोगों के बीच ले जाया जाता है। हर व्यक्ति दोनों हथेलियाँ लौ के थोड़ा ऊपर ले जाकर उस गर्मी को आँखों और माथे तक छुआता है।
  8. चरणामृत और प्रसाद। अंत में जल या चरणामृत और प्रसाद बाँटा जाता है, जिसके साथ पूजा पूरी मानी जाती है।
दशाश्वमेध घाट, वाराणसी में संध्या गंगा आरती के दौरान भगवा वस्त्रधारी पुजारी शंख बजाते हुए
Photo: Chetanbtc / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

लौ की गर्मी हथेलियों में क्यों ली जाती है

आरती का यह आख़िरी हिस्सा सबसे ज़्यादा किया जाता है और सबसे कम समझा जाता है। लोग हाथ बढ़ाते हैं, गर्मी लेते हैं, आँखों तक ले जाते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। इसके पीछे की मान्यता सीधी है। जो प्रकाश अभी-अभी मूर्ति पर पड़ा है, उसे लौटता हुआ प्रकाश माना जाता है, और पारंपरिक रूप से माना जाता है कि वह उस स्पर्श का कुछ अंश अपने साथ लेकर आता है। हथेलियों में उस गर्मी को समेटकर अपनी ओर खींच लेना उसी अंश को ग्रहण करने का तरीका है।

ध्यान देने लायक बात यह है कि पूरी पूजा में यह अकेला क्षण है जब देने की दिशा उलट जाती है। उससे पहले सब कुछ भक्त की ओर से जा रहा था, जल, वस्त्र, फूल, भोग, गंध। यहाँ पहली बार कुछ वापस आता है, और वह भी छूकर महसूस होने वाले रूप में। आँखों तक लाया जाना भी इसी कारण है, क्योंकि दर्शन का पूरा भाव आँख से जुड़ा है और यह स्पर्श उसी दर्शन को शरीर तक उतार देता है।

लगभग हर पूजा का समापन आरती से ही क्यों

पूजा को अगर अतिथि सत्कार की तरह देखा जाए तो आरती की जगह अपने आप समझ आ जाती है। आवाहन में देवता को बुलाया जाता है, आसन दिया जाता है, स्नान कराया जाता है, वस्त्र और आभूषण अर्पित होते हैं, भोग लगाया जाता है। यह सब किसी सम्मानित अतिथि के आने पर किए जाने वाले व्यवहार से मेल खाता है। और जब अतिथि विदा लेता है तो दहलीज़ पर दीपक दिखाकर उसे विदा किया जाता है। आरती उसी शिष्टाचार का धार्मिक रूप है, इसलिए वह अंत में आती है, शुरुआत में नहीं।

दूसरी वजह ज़्यादा व्यावहारिक है। पूजा का बाक़ी हिस्सा संस्कृत मंत्रों और तय विधि पर टिका होता है, जिसमें हर कोई बराबर से शामिल नहीं हो पाता। आरती वह हिस्सा है जिसमें शामिल होने के लिए कुछ जानना ज़रूरी नहीं। खड़े होना, ताली की लय पकड़ना, दो पंक्तियाँ साथ गा लेना, और अंत में गर्मी ले लेना, इतना ही काफ़ी है। बच्चे, बुज़ुर्ग, वे लोग जो पूरी विधि से अनजान हैं, सब इसी हिस्से में एक साथ आ जाते हैं। किसी भी परंपरा में जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों तक पहुँचती है, वही सबसे लंबे समय तक टिकती भी है, और आरती के साथ ठीक यही हुआ।

इसे निभाने के लिए बड़े इंतज़ाम की ज़रूरत नहीं पड़ती। घर के मंदिर में शाम को जलाया गया एक अकेला दीया, घंटी की आवाज़ के साथ कुछ बार धीरे-धीरे घुमाया गया, वही पूरा ढाँचा अपने भीतर समेटे रहता है जो घाटों की भव्य सामूहिक आरती में दिखाई देता है। पैमाना बदलता है, भजन के शब्द बदल जाते हैं। जो नहीं बदलता वह वही मूल क्रिया है: अंधेरे में एक लौ उठाना, उसे उस ओर घुमाना जिसे आप मानते हैं, और फिर उसी लौ की गर्मी को वापस अपने चेहरे तक ले आना।

Dakshyani Editorial

The editorial team at Dakshyani researches and writes accessible guides to Indian mythology, temples, festivals, and living traditions.

सभी लेख देखें →

अपने विचार साझा करें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं